हमारे चेतन मन पर भले ही वर्तमान हावी हो, लेकिन अवचेतन में अतीत की यादें गहरे तक छिपी होती हैं। ऐसा न होता तो बीते दिनों की यादें क्यों सपनों में फिर लौटतीं? बचपन का घर, सहपाठी, गांव-शहर के वे चेहरे अकसर सपनों में आते हैं, जिन्हें जाग्रत स्थिति में चाह कर भी याद नहीं कर पाते। ये सारे चेहरे ठीक वैसे ही सपनों में आते हैं, जैसे वे वास्तव में तब होते थे। कई बार कोई गीत, घटना, मौसम या पल पुराने दिनों में लौटा देता है। आंखों के आगे दृश्य कौंधने लगते हैं। जबकि यथार्थ में वक्त ही नहीं होता कि अतीत को याद करें। वर्तमान की घटनाएं, चिंता, व्यस्तता इतनी होती है कि अतीत भूलता जाता है। अगर वह विस्मृत न होता तो जिंदगी कैसे अपनी लय में आगे बढती! जो बीत गया-लौट नहीं सकता, उसे इतना न याद करें कि वह आज पर हावी हो।करोगे याद तो हर बात याद आएगी
ये ब्लॉग मेरे मन की बातों का संग्रह है .... चाहता हूँ की दुनिया की तस्वीर बदल सकूं ... इसलिए खुद को बदलने निकला हूँ .
Saturday, January 17, 2009
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