दिल ढूंढता है फिर वही
बहुत समय पहले की बात थी..वंस अपॉन ए टाइम..बचपन की कहानियां अकसर फ्लैश बैक में चला करती थीं। इनमें दुष्ट राक्षस द्वारा कैद की गई खूबसूरत राजकुमारी थी, जिसे घोडे पर सवार राजकुमार आजाद कराता था। इनमें जादू की छडी घुमाकर जन्नत की सैर कराने वाली, रात में फूलों की घाटी पर उतरने वाली चमकीली परियां भी थीं। परीकथाओं की जगह अब स्पाइडर मैन व हैरी पॉटर की जादुई दुनिया ने ले ली है। परियां, तितलियां और मां के हाथों की बनी बडियां गुजरे जमाने का हिस्सा हैं। अब तो शायद ही नन्ही लडकियां झाडू की सींकों पर फंदे डालकर बुनाई का पहला पाठ सीखती होंगी, शायद ही बच्चे गिल्ली-डंडा खेलते होंगे। संभव है, गांवों में यह परंपरा अभी कायम हो, लेकिन फैलते जा रहे शहर अब ये फुर्सत खो चुके हैं।
पिछले तीस-चालीस वर्षो में कितना-कुछ बदल गया! बहुत दिन नहीं हुए जब बेहतरीन संगीत का आनंद ग्रामोफोन पर उठाते थे लोग, दूसरे शहर में बात करने के लिए ट्रंक कॉल बुक करानी पडती थी। बुधवार-शुक्रवार का चित्रहार, रविवार सुबह का महाभारत-रामायण तो हाल-हाल की बातें हैं। बच्चों के पसंदीदा कार्यक्रम मालगुडी डेज की ताना ना ना ना..की धुन कानों में अब भी गूंजती है।
अतीत जिंदगी का बीता हुआ हिस्सा है। उम्र जितनी आगे जाती है, यादें उतनी ही प्यारी लगने लगती हैं। यह भी सच है कि अतीत में जीने की आकांक्षा विकास प्रक्रिया के विरुद्ध है। इसलिए प्रकृति ने हमारी स्मरण-शक्ति को इस लायक बनाया है कि हम अच्छी यादों को संजोए रखते हैं, बुरी यादों को बिसरा देते हैं। जो ऐसा नहीं कर पाते, वे समय के साथ नहीं चल पाते, ठहर जाते हैं बीते कल के साथ।
उपरोक्त वक्तव्य का सार यह है की जीवन का चक्र सदा ऐसे ही चलता रहता है और हर पल हमेशा बदलता रहता है इसलिए हमारी यही सलाह है की इस जीवन को भलीभांति जी लो और ऐसे जियो की किसी को दुःख न हो
अपना अमूल्य समय देने के लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद्
No comments:
Post a Comment