Monday, September 7, 2009

Lucknow !!

ये शहर बडे पुराने हैं

बदल गई है तहजीब लखनऊ की

नवाब जाफर मीर अब्दुल्ला (अंतिम मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर के वंशज)

लखनऊ की बात आते ही तहजीब, अदब, नफासत और नजाकत जैसे शब्द एक साथ जेहन में आते हैं जहां पहले आप की संस्कृति अभी भी जिंदा है। विकास की आंधी में पुराने और नए लखनऊ में फर्क हो गया। कारण यह कि नए लखनऊ में विकास ज्यादा हुआ। अभी मैं शीश महल, हुसैनाबाद में रहता हूं, जो नवाब आसफुद्दौला का महल था। पीछे मुडकर देखने पर मुझे यहां की गंगा-जमुनी तहजीब याद आती है। 40-50 सालों में तो बहुत-कुछ बदल गया। बंटवारे के बाद पाकिस्तान-पंजाब से शरणार्थी यहां आए और यहां के काफी लोग सीमा पार गए। वे यहां के लोगों के लिए दूसरे ग्रह से आए प्राणियों की तरह थे। इससे सांस्कृतिक असंतुलन पैदा हुआ।

1952 में जमींदारी उन्मूलन के बाद ताल्लुकदारों-जमींदारों की काफी जमीनें सरकार ने ले लीं। तहजीब को सुरक्षित रखने व बचाने-बढाने में इनकी भूमिका अहम थी, लिहाजा संस्कृति पर इसका प्रभाव पडा। लखनऊ राजनीति का गढ रहा है। विकास प्रक्रिया में शहरों की तहजीब और मौलिकता भी खोती है। यहां भी मॉल्स खडे हो गए, यह एक मेट्रो शहर हो गया।

पुराना खानपान, रीति-रिवाज, बोली पुराने लखनऊ में आज भी है। लेकिन ऐतिहासिक इमारतें मरम्मत की बाट जोह रही हैं।

लखनऊ अपने खानपान, लिबास, कथक और संगीत घरानों के लिए जाना जाता रहा है। मुशायरों, शेरो-शायरी का दौर कम हुआ, ऐसे में बुद्धिजीवियों, साहित्यकारों को थोडी घुटन भी होने लगी। लेकिन सबसे सकारात्मक बात यह है कि एक ऐसे माहौल में जब नफरत की दीवारें ऊंची होती जा रही हैं, लखनऊ में सभी धर्मो के बीच सही तालमेल नजर आता है। यह बात आश्वस्त करती है।

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