Monday, May 11, 2015

पीकू

कल अपने कुछ पारिवारिक दोस्तों के साथ पीकू मूवी देखने गया, बहुत दिनो के बाद कोई ऐसी फिल्म देखी जो ना जाने क्यों दिल में घर कर गई. सोचा इस के बारे में कुछ लिखूं..... .
फिर अचानक मयंक शेखर, फिल्म समीक्षक की ये समीक्षा देखी जिन्होंने हर वो बात अपनी समीक्षा में लिखी है जो मै लिखना चाहता हूँ. मै वही यहाँ पोस्ट कर रहा हूँ उम्मीद है की आप को पढ़ कर अच्छा लगे.


पीकू पर आपका दिल आ जाएगा ...'

  • 8 मई 2015
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अमिताभ बच्चन, दीपिका पादुकोण, इरफ़ान ख़ान
पीकू
निर्देशकः शूजित सरकार
कलाकारः दीपिका पादुकोण, अमिताभ बच्चन, इरफ़ान ख़ान
रेटिंगः ****
ये फ़िल्म पारिवारिक गड़बड़ झालों पर बनी सच्ची कॉमेडी है. अमरीका में अप्रचलित विषयों पर इस तरह की कटाक्ष करने वाली फ़िल्में अक्सर बनती हैं.
आप में से बहुतों ने 'लिटिल मिस सनशाइन' या 'माई बिग फ़ैट गीक वेडिंग' जैसी फ़िल्में देखी होंगी.
आप आम भद्रलोकनुमा बंगाली परिवार या उस जैसे किसी भारतीय परिवार के बारे में जो सोचते होंगे, ये फ़िल्म उससे काफ़ी अलग है.
ये दक्षिणी दिल्ली के चितरंजन पार्क में रहने वाले एक प्रवासी बंगाली परिवार की कहानी है.
ख़ुद्दार लेकिन थोड़ा लिजलिजा पिता (अमिताभ बच्चन) नहीं चाहता कि उसकी 30 साल की बेटी (दीपिका पादुकोण) कभी शादी करे. उसकी इस सोच के पीछे जो भी कारण हैं उनसे वो कुछ ज़्यााद ही स्वार्थी प्रतीत होता है. वो चाहता है कि उसकी बेटी बस उसके साथ रहे.
वो अपनी बेटी के संभावित ब्वॉयफ्रेंड को भड़काने के लिए उससे यहाँ तक कह देता है कि उसकी बेटी अब वर्जिन (कुंवारी) नहीं है.

बंगाली समाज का चित्रण

लड़की की माँ की मौत हो चुकी है. ये बताने के लिए फ़िल्म में किसी परपंरागत मातम या श्रद्धाजंलि का सहारा लेने की बजाय हल्के-फुल्के ढंग से ज़ाहिर किया गया है. परिवार में आने वाले अंकल-आंटियों और फेमली फ्रेंडों का अपना-अपना ख़ास रंग-ढंग है.
फ़िल्म का नाम बेटी के नाम पर ही रखा गया है. जी हाँ, इस फ़िल्म में ख़ूबसूरत दीपिका पादुकोण का नाम 'पीकू' है. ये कोई हैरान होने वाली बात नहीं है.
पंजाबियों की तरह बंगाली भी अपने बच्चों के जन्म के समय उनके घरेलू नाम (जैसे पूपू, बाबला, किनकिनी आदि) रखने के लिए जाने जाते हैं. ये अजीबो ग़रीब नाम इन बच्चों से जीवन भर चिपके रहते हैं.
इस फ़िल्म में बंगाली समाज की आदतों को अपने अंदाज़ में चित्रित करने की कोशिश की गई है. वो आदत है, पेट साफ़ होने को लेकर कुछ ज़्यादा ही चिंतित रहना. 'टॉयलेट ह्यूमर' यानी शौच से जुड़ी हुए हंसी मज़ाक़ पर भी फ़िल्म में ज़ोर है.

रोड मूवी

बहुत से बंगालियों का अंग्रेजों के रहन-सहन से गहरा प्यार जगजाहिर है. पेट साफ होने के ऑब्सेशन पर मज़ाक इस फ़िल्म के केंद्र में है, कई बार तो लगता है कि कुछ ज़्यादा ही हो रहा है.
फ़िल्म में पिता का पेट साफ होगा या नहीं उसका पूरा दिन इसी बात पर निर्भर होता है. उसे हमेशा भ्रम रहता है कि उसे कब्ज़ है.
इस बुज़ुर्ग की दूसरी समस्या है कि वो ट्रेन या हवाईजहाज़ से सफ़र नहीं कर पाते. उसे अपने होमटाउन कोलकाता की बहुत याद आती है. यानी वो कोलकाता बस सड़क के रास्ते से जा सकते हैं.
इस तरह ये एक रोड मूवी है जो दिल्ली और कोलकाता जाने के 1500 किलोमीटर के सफ़र के दौरान भारत के नेशनल हाईवे पर घटित होती है.
इस सफ़र में पिता और बेटी के साथ हैं उनके घरेलू नौकर और टैक्सी कंपनी का मालिक (इरफ़ान ख़ान) जो इस बात पर हैरान है कि वो इस लफड़े में फंसा कैसे?

कमाल का लेखन

रुपहले पर्दे पर इससे पहले कुछ चरित्रों को प्यार की तलाश में रोड ट्रिप पर निकलते हुए मैंने होमी अदजानिया की फ़िल्म फाइंडिंग फ़ैनी (2014) में देखा था.
इस फ़िल्म में नसीरुद्दीन शाह और पंकज कपूर मुख्य भूमिका में थे और उनके साथ थीं दीपिका पादुकोण जो इस फ़िल्म में भी हैं.
फ़ाइंडिंग फ़ैनी अंग्रेजी में थी और ऐसा लगता है कि पीकू बांग्ला में बनती तो बेहतर होता. अपने चुटकुलों, खिलंदड़पने और रोज़मर्रा की ज़िंदगी की छोटी-छोटी ख़ुशियों के मामले में एक जैसी होती हुई भी पीकू, फाइंडिंग फ़ैनी से काफ़ी अलग है.
बतौर लेखक जूही चतुर्वेदी की यह दूसरी फ़िल्म है. उनकी पहली फ़िल्म थी अपनी तरह की अलग जबरदस्त कॉमेडी फ़िल्म विक्की डोनर. फ़िल्म के निर्देशक शूजित सरकार भी अपने सहज और सरल निर्देशन के लिए बधाई के पात्र हैं.
फ़िल्म क्राफ्ट पर शूजित की पकड़ काफ़ी मज़बूत है. वो फ़िल्म की कहानी और पात्रों को दर्शकों से सीधा संवाद स्थापित करने देते हैं.
निर्देशक के रूप में ये उनकी चौथी फ़िल्म है. इससे पहले वो यहाँ (कश्मीर में चरमपंथ पर), मद्रास कैफ़ै (राजीव गांधी की हत्या पर) और विक्की डोनर (स्पर्म डोनेशन पर) बना चुके हैं.

अमिताभ की उम्र

इस फ़िल्म के साथ ही शूजित ने ख़ुद को एक बहुआयामी निर्देशक के रूप में मज़बूती से स्थापित कर लिया है.
मैंने अभी तक फ़िल्म के मुख्य चरित्र भास्कर की भूमिका निभाने वाले अमिताभ बच्चन के बारे में कुछ कहा ही नहीं. उनकी पिछली फ़िल्म आर बाल्की की 'शमिताभ' एक मौलिक फ़िल्म थी लेकिन उसकी उतनी तारीफ़ नहीं हुई जितनी होनी चाहिए थी.
72 साल की उम्र में वो अपने करियर के सबसे रचनात्मक दौर से गुज़र रहे हैं. फ़िल्म से इसी एक विषय पर मुझे शिकायत है. फ़िल्म के मुख्य चरित्र की उम्र भी लगभग उतनी ही है जितनी अमिताभ की. हालांकि फ़िल्म में वो थोड़ा थकाऊ, तोंदू, सठियाया हुआ, कमज़ोर और स्वार्थी है.
पीकू
70 को अब नया 50 माना जाने लगा है. ख़ुद बच्चन इसके सबसे अच्छे उदाहरण हैं. उनकी उम्र फ़ि्ल्म में थोड़ी ज़्यादा दिखाई जाती तो बेहतर होता.

दीपिका का टूथपेस्ट वाला सीन

अमिताभ बच्चन ने हृषिकेश मुखर्जी की क्लासिक फ़िल्म आनंद (1971) में भी भास्कर नामक बंगाली चरित्र की भूमिका निभाई थी. कुछ साल पहले उन्होंने रितुपर्णो घोष की शेक्सपियर के नाटक पर आधारित फ़िल्म द लास्ट लियर (2007) में भी एक बंगाली चरित्र निभाया था.
मुझे किसी ने बताया कि वो चरित्र कुछ कुछ प्रसिद्ध अभिनेता उत्पल दत्त पर आधारित था. हालांकि बच्चन के स्तर को देखते हुए वो भूमिका उतनी संतोषजनक नहीं रही थी.
लेकिन इस बार उन्होंने एक खिसियाए हुए बंगाली बुज़ूर्ग के चरित्र को बखूबी पकड़ा है. उनका बड़बोला चरित्र, दीपिका और इरफ़ान के शांत किरदार के उलट कहानी को सटीक संतुलन देता है. और आँखों से अभिनय करने के मामले में बच्चन से बेहतर भला कौन हो सकता है.
अगर दीपिका की बात की जाए तो उनके हाथों में टूथपेस्ट और होंठों पर उसकी झाग मेरा दिल ले गए.
मैं जो कह रहा हूँ उसे समझने के लिए आपको फ़िल्म में वो सीन देखना होगा जब इरफ़ान ख़ान आधी रात को उनके घर आते हैं और वो कुछ इस हालत में दरवाज़ा खोलती हैं.
मेरी दो टूक राय तो ये है कि आप फ़िल्म ज़रूर देखें. इस कॉमेडी फ़िल्म को देखकर मैं थोड़ा भावुक भी हो गया कि हम अपने रोज़मर्रा के जीवन में अपने बड़े-बूढ़ों की कैसे उपेक्षा करते हैं. उन्हें वाजिब तवज्जो नहीं देते.
बढ़ती उम्र से उपजी उनकी अजीब आदतों के संग कितनी असहनशील और अधैर्य होकर पेश आते हैं. भगवान जाने वो कब हमारे बीच से चले जाएँ और हम उनकी कमी हमेशा खलती रहे!

Thursday, September 5, 2013

माँ .... ( दुनिया का सबसे प्यारा शब्द)

आज मैंने फेसबुक पर माँ पर एक पोस्ट पढ़ी इतनी भावुक कर देने वाली पोस्ट मैंने बहुत ही कम देखें हैं .. सोचा की फेसबुक पर वो पोस्ट ना जाने कहीं कब खो जाए इससे पहले मै उसे अपने ब्लॉग पर संजो कर रख लूं ..  माँ के बारे में कुछ कहने के लिए यूँ तो किसी भी भाषा के शब्द कम पड़ जायें .. पर नीचे लिखी पंक्तियाँ कितनी ख़ूबसूरती से माँ की ममता और और उसकी लाचारी का वर्णन करती हैं .. की बस आँखों आंसू ही आ जाएँ ... 



एक माँ चटाई पे लेटी आराम से सो रही थी...
कोई स्वप्न सरिता उसका मन भिगो रही थी...

तभी उसका बच्चा यूँ ही गुनगुनाते हुए आया...
माँ के पैरों को छूकर हल्के हल्के से हिलाया...

माँ उनीदी सी चटाई से बस थोड़ा उठी ही थी...
तभी उस नन्हे ने हलवा खाने की ज़िद कर दी...

माँ ने उसे पुचकारा और फिर गोद मेले लिया...
फिर पास ही ईंटों से बने चूल्हे का रुख़ किया...

फिर उनने चूल्हे पे एक छोटी सी कढ़ाई रख दी...
फिर आग जला कर कुछ देर उसे तकती रही...

फिर बोली बेटा जब तक उबल रहा है ये पानी...
क्या सुनोगे तब तक कोई परियों वाली कहानी...

मुन्ने की आँखें अचानक खुशी से थी खिल गयी...
जैसे उसको कोई मुँह माँगी मुराद हो मिल गयी...


माँ उबलते हुए पानी मे कल्छी ही चलाती रही...
परियों का कोई किस्सा मुन्ने को सुनाती रही...



फिर वो बच्चा उन परियों मे ही जैसे खो गया....
सामने बैठे बैठे ही लेटा और फिर वही सो गया... 

फिर माँ ने उसे गोद मे ले लिया और मुस्काई...
फिर पता नहीं जाने क्यूँ उनकी आँख भर आई...

जैसा दिख रहा था वहाँ पर सब वैसा नही था...
घर मे इक रोटी की खातिर भी पैसा नही था...

राशन के डिब्बों मे तो बस सन्नाटा पसरा था...
कुछ बनाने के लिए घर मे कहाँ कुछ धरा था...

न जाने कब से घर मे चूल्हा ही नहीं जला था...
चूल्हा भी तो बेचारा माँ के आँसुओं से गला था...

फिर उस बेचारे को वो हलवा कहाँ से खिलाती...
उस जिगर के टुकड़े को रोता भी कैसे देख पाती...

वो मजबूरी उस नन्हे मन को माँ कैसे समझाती...
या फिर फालतू मे ही मुन्ने पर क्यूँ झुंझलाती...

इसलिए हलवे की बात वो कहानी मे टालती रही...
जब तक वो सोया नही, बस पानी उबालती रही..


उम्मीद है आपको ये पंक्तियाँ पसंद आई होंगी ... ये मेरी कृति नहीं है .. पर इसके रचयिता को मै ह्रदय से नमन करता हूँ.

Monday, May 13, 2013

माँ

www.facebook.com/abhishek.gov.in



माँ, माँ संवेदना है, भावना है अहसास है

माँ, माँ जीवन के फूलों में खुशबू का वास है,





माँ, माँ रोते हुए बच्चे का खुशनुमा पलना है,

माँ, माँ मरूथल में नदी या मीठा सा झरना है,




माँ, माँ लोरी है, गीत है, प्यारी सी थाप है,

माँ, माँ पूजा की थाली है, मंत्रों का जाप है,




माँ, माँ आँखों का सिसकता हुआ किनारा है,


माँ, माँ गालों पर पप्पी है, ममता की धारा है,



माँ, माँ झुलसते दिलों में कोयल की बोली है,

माँ, माँ मेहँदी है, कुमकुम है, सिंदूर है, रोली है,





माँ, माँ कलम है, दवात है, स्याही है,

माँ, माँ परमात्मा की स्वयं एक गवाही है,


माँ, माँ त्याग है, तपस्या है, सेवा है,

माँ, माँ फूँक से ठँडा किया हुआ कलेवा है,





माँ, माँ चूडी वाले हाथों के मजबूत कंधों का नाम है,

माँ, माँ काशी है, काबा है और चारों धाम है,


माँ, माँ चिंता है, याद है, हिचकी है,

माँ, माँ बच्चे की हर चोट पर सिसकी है,





माँ, माँ चुल्हा-धुँआ-रोटी और हाथों का छाला है,


माँ, माँ ज़िंदगी की कड़वाहट में अमृत का प्याला है,



माँ, माँ पृथ्वी है, जगत है, धूरी है,

माँ बिना इस सृष्टि की कल्पना अधूरी है,





(आदरणीय कवि हरि ओम व्यास की भाव पूर्ण पंक्तियाँ)

Tuesday, November 6, 2012

मुश्किल है अपना मेल प्रिये ....

















मुश्किल है अपना मेल प्रिये, ये प्यार नही है खेल प्रिये ।

तुम एम. ए. फ़र्स्ट डिवीजन हो, मैं हुआ मैट्रिक फ़ेल प्रिये ।

मुश्किल है अपना मेल प्रिये, ये प्यार नही है खेल प्रिये ।


तुम फौजी अफ़्सर की बेटी, मैं तो किसान का बेटा हूँ ।
तुम रबडी खीर मलाई हो, मैं सत्तू सपरेटा हूँ ।
तुम ए. सी. घर में रहती हो, मैं पेड के नीचे लेटा हूँ ।
तुम नयी मारूती लगती हो, मैं स्कूटर लम्बरेटा हूँ ।
इस कदर अगर हम छुप-छुप कर, आपस मे प्रेम बढायेंगे ।
तो एक रोज़ तेरे डैडी अमरीश पुरी बन जायेंगे ।
सब हड्डी पसली तोड मुझे, भिजवा देंगे वो जेल प्रिये ।
मुश्किल है अपना मेल प्रिये, ये प्यार नही है खेल प्रिये ।

तुम अरब देश की घोडी हो, मैं हूँ गदहे की नाल प्रिये ।
तुम दीवली क बोनस हो, मैं भूखों की हडताल प्रिये ।
तुम हीरे जडी तश्तरी हो, मैं एल्मुनिअम का थाल प्रिये ।
तुम चिकेन-सूप बिरयानी हो, मैन कंकड वाली दाल प्रिये ।
तुम हिरन-चौकडी भरती हो, मैं हूँ कछुए की चाल प्रिये ।
तुम चन्दन-वन की लकडी हो, मैं हूँ बबूल की चाल प्रिये ।
मैं पके आम सा लटका हूँ, मत मार मुझे गुलेल प्रिये ।
मुश्किल है अपना मेल प्रिये, ये प्यार नही है खेल प्रिये ।

मैं शनि-देव जैसा कुरूप, तुम कोमल कन्चन काया हो ।
मैं तन-से मन-से कांशी राम, तुम महा चन्चला माया हो ।
तुम निर्मल पावन गंगा हो, मैं जलता हुआ पतंगा हूँ ।
तुम राज घाट का शान्ति मार्च, मैं हिन्दू-मुस्लिम दन्गा हूँ ।
तुम हो पूनम का ताजमहल, मैं काली गुफ़ा अजन्ता की ।
तुम हो वरदान विधाता का, मैं गलती हूँ भगवन्ता की ।
तुम जेट विमान की शोभा हो, मैं बस की ठेलम-ठेल प्रिये ।
मुश्किल है अपना मेल प्रिये, ये प्यार नही है खेल प्रिये ।

तुम नयी विदेशी मिक्सी हो, मैं पत्थर का सिलबट्टा हूँ ।
तुम ए. के.-४७ जैसी, मैं तो इक देसी कट्टा हूँ ।
तुम चतुर राबडी देवी सी, मैं भोला-भाला लालू हूँ ।
तुम मुक्त शेरनी जंगल की, मैं चिडियाघर का भालू हूँ ।
तुम व्यस्त सोनिया गाँधी सी, मैं वी. पी. सिंह सा खाली हूँ ।
तुम हँसी माधुरी दीक्षित की, मैं पुलिसमैन की गाली हूँ ।
कल जेल अगर हो जाये तो, दिलवा देन तुम बेल प्रिये ।
मुश्किल है अपना मेल प्रिये, ये प्यार नही है खेल प्रिये ।

मैं ढाबे के ढाँचे जैसा, तुम पाँच सितारा होटल हो ।
मैं महुए का देसी ठर्रा, तुम रेड-लेबल की बोतल हो ।
तुम चित्रहार का मधुर गीत, मैं कॄषि-दर्शन की झाडी हूँ ।
तुम विश्व-सुन्दरी सी कमाल, मैं तेलिया छाप कबाडी हूँ ।
तुम सोनी का मोबाइल हो, मैं टेलीफोन वाला हूँ चोंगा ।
तुम मछली मानसरोवर की, मैं सागर तट का हूँ घोंघा ।
दस मन्ज़िल से गिर जाउँगा, मत आगे मुझे ढकेल प्रिये ।
मुश्किल है अपना मेल प्रिये, ये प्यार नही है खेल प्रिये ।

तुम सत्ता की महरानी हो, मैं विपक्ष की लाचारी हूँ ।
तुम हो ममता-जयललिता सी, मैं क्वारा अटल-बिहारी हूँ ।
तुम तेन्दुलकर का शतक प्रिये, मैं फ़ॉलो-ऑन की पारी हूँ ।
तुम गेट्ज़, मटीज़, कोरोला हो, मैं लेलैन्ड की लॉरी हूँ ।
मुझको रेफ़री ही रहने दो, मत खेलो मुझसे खेल प्रिये ।
मुश्किल है अपना मेल प्रिये, ये प्यार नही है खेल प्रिये ।

मैं सोच रहा कि रहे हैं कब से, श्रोता मुझको झेल प्रिये ।
मुश्किल है अपना मेल प्रिये, ये प्यार नही है खेल प्रिये




(साभार इन्टरनेट जगत से )

Thursday, July 12, 2012

रक्तदान (जीवनदान)



रक्‍तदान

खून चढाने की जरूरत:-

जीवन बचाने के लिए खून चढाने की जरूरत पडती है। दुर्घटना,  रक्‍तस्‍त्राव,  प्रसवकाल और ऑपरेशन आदि अवसरों में शामिल है,  जिनके कारण अत्‍यधिक खून बह सकता है और इस अवसर पर उन लोगों को खून की आवश्‍यकता पडती है। थेलेसिमिया,  ल्‍यूकिमिया,  हीमोफिलिया जैसे अनेंक रोगों से पीडित व्‍यक्तियों के शरीर को भी बार-बार रक्‍त की आवश्‍यकता रहती है अन्‍यथा उनका जीवन खतरे में रहता है। जिसके कारण उनको खून चढाना अनिवार्य हो जाता है।

रक्‍तदान की आवश्‍यकता:-

इस जीवनदायी रक्‍त को एकत्रित करने का एकमात्र् उपाय है रक्‍तदान। स्‍वस्‍थ लोगों द्वारा किये गये रक्‍तदान का उपयोग जरूरतमंद लोगों को खून चढानें के लिये किया जाता है। अनेक कारणों से जैसे उन्‍नत सर्जरी के बढतें मामलों तथा फैलती जा रही जनसंख्‍या में बढती जा रही बीमारियों आदि से खून चढाने की जरूरत में कई गुना वृद्वि हुई है। लेकिन रक्‍तदाताओं की कमी वैसी ही बनी हुई है। लोगों की यह धारणा है कि रक्‍तदान से कमजोरी व नपूसंकता आती है, पूरी तरह बेबूनियाद है।  आजकल चिकित्‍सा क्षेत्र में कॅम्‍पोनेन्‍ट थैरेपी विकसित हो रही है,  इसके अन्‍तर्गत रक्‍त की इकाई से रक्‍त के विभिन्‍न घटकों को पृथक कर जिस रोगी को जिस रक्‍त की आवश्‍यकता है दिया जा सकता है इस प्रकार रक्‍त की एक इकाई कई मरीजों के उयोग में आ सकती है।

रक्‍त कौन दे सकता है?

ऐसा प्रत्‍येक पुरूष अथवा महिला:-

  1. जिसकी आयु 18 से 65 वर्ष के बीच हो।
  2. जिसका वजन (100 पौंड) 48 किलों से अधिक हो।
  3. जो क्षय रोग, रतिरोग, पीलिया, मलेरिया, मधुमेंह, एड्स आदि बीमारियों से पीडित नहीं हो।
  4. जिसने पिछले तीन माह से रक्‍तदान नहीं किया हो।
  5. रक्‍तदाता ने शराब अथवा कोई नशीलीदवा न ली हो।
  6. गर्भावस्‍था तथा पूर्णावधि के प्रसव के पश्‍चात शिशु को दूध पिलाने की 6 माह की अवधि में किसी स्‍त्री से रक्‍तदान स्‍वीकार नहीं किया जाता है।

कितना रक्‍त लिया जाता है?

प्रतिदिन हमारे शरीर में पुराने रक्‍त का क्षय होता रहता है ओर प्रतिदिन नया रक्‍त बनता है रहता है।
एकबार में 350 मिलीलीटर यानि डेढ पाव रक्‍त ही लिया जाता है (कुल रक्‍त का 20 वॉं भाग)
शरीर 24 घंटों में दिये गये रक्‍त के तरल भाग की पूर्ति कर लेता है।
ब्‍लड बैंक रेफ्रिजरेटर में रक्‍त 4 - 5 सप्‍ताह तक सुरक्षित रखा जा सकता है।

क्‍या रक्‍तदान से दाता का कोई लाभ होता है?

हॉं। रक्‍तदान द्वारा किसी को नवजीवन देकर जो आत्मिक आनन्‍द मिलता है उसका न तो कोई मूल्‍य ऑंका जा सकता है न ही उसे शब्‍दों में व्‍यक्‍त किया जा सकता है। चिकित्‍सकों का यह मानना है कि रक्‍तदान खून में कोलेस्‍ट्रॉल की अधिकता रक्‍त प्रवाह में बाधा डालती है। रक्‍त दान शरीर द्वारा रक्‍त बनाने की क्रिया को भी तीव्र कर देता है। रक्‍त के कणों का जीवन सिर्फ 90 से 120 दिन तक का होता है। प्रतिदिन हमारे शरीर में पुराने रक्‍त का क्षय होता रहता है और नया रक्‍त बनता जाता है इका हमें कोई अनुभव नहीं होता। बहुत से स्‍त्री-पुरूषों ने नियमित रूप से रक्‍त दान करने का क्रम बना रखा है। अतः आप भी नियमित रूप से स्‍वैच्छिक रक्‍तदान करें,  जिससे रक्‍त की हमेशा उपलब्‍धता बनी रहे कोई सुहागिन विधवा न बने,  वृद्व मॉ-बाप बेसहारा न हो, खिलता यौवन असमय ही काल कलवित न हो आज किसी को आपके रक्‍त की आवश्‍यकता है,  हो सकता है कल आपको किसी के रक्‍त की आवश्‍यकता हो अतः निडर होकर स्‍वैच्छिक रक्‍त दान करें।

रक्‍त दान कहॉं करें?

रक्‍तदान किसी भी लाईसेन्‍स युक्‍त ब्‍लड बैंक में किया जा सकता है। यह सुविधा सभी जिला-चिकित्‍सालयों में भी उपलब्‍ध है। राज्‍य के सरकारी 43 एवं निजी क्षेत्र में 18 ब्‍लड बैंक लाईसेन्‍स युक्‍त है। इसके अलावा मान्‍यता प्राइज़ एजेन्सियों जैसे रोटरी क्‍लब, लायंस क्‍लब आदि द्वारा समय-समय पर रक्‍तदान शिविरों का आयोजन किया जाता है। इनमें से किसी भी अधिकृत सील पर आप स्‍वैच्‍छा से निश्चित होकर रक्‍तदान कर सकते हैं।

रक्‍त संचार से पहले जांच?

ब्‍लड बैंक में जारी करने से पहले रक्‍त की प्रत्‍येक इकाई का परीक्षण मलेरिया,  सिफलिस,  हिपेटाइटिस (सी) व एच.आई.वी. के लिए किया जाता है ताकि सुरक्षित रक्‍त ही मरीज को पहुंचे।

क्‍या रक्‍तदान कष्‍टकारक या हानिकारक होता है?

  1. रक्‍त देते समय कोई पीडा नहीं होती है।
  2. रक्‍तदान करने में 5 से 10 मिनट का समस लगता है।
  3. रक्‍त देन के पश्‍चात आप सभी कार्य सामान्‍य रूप से कर सकते हैं।
  4. रक्‍तदाता के सामान्‍य स्‍वास्‍थ्‍य प कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पडता है।

स्‍वेच्‍छा से दिया गया रक्‍त, बेचने वाले के रक्‍त से अच्‍छा होता है क्‍योंकि:-

स्‍वेच्‍छा से रक्‍त देने वाला मनुष्‍य,  मानव मात्र् की सहायता के लिये रक्‍त देता है, न की धन के लालच से इसलिए वह किसी प्रकार की वर्तमान या पुरानी बीमारी का बतानें में नहीं हिचकिचाता,  जिससे रक्‍त प्राइज़ करने वाले का जीवन खतरें में पड सकता है। रक्‍त बेचने वाला धन के लालच में अपने हर रोग को छिपाने का प्रयत्‍न करता है। जिससे रक्‍त प्राइज़ करने वाले को कई प्रकार की बीमारियां लग सकती है। ओर उसका जीवन भी खतरे में पड सकता है। पेशेवर रक्‍तदाता बिना अन्‍तराल के जल्‍दी-जल्‍दी रक्‍तदान करते हैं जिससे उनके रक्‍त में गुणवता का भी आभास हो जाता है।

रक्‍तदाता कार्ड:-

स्‍वेच्‍छा से रक्‍तदान करने वाले व्‍यक्ति को रक्‍तदान करने के तुरन्‍त बाद रक्‍तदाता ऋण पत्र / प्रमाणपत्र जारी किया जाता है। जिससे वह रक्‍तदान की तिथि से 12 महिनें तक आवश्‍यकता पडने पर स्‍वंय या अपने परिवारजन के लिये ब्‍लड बैंक से एक यूनिट रक्‍त प्राइज़ कर सकता है अगर आपका या आपके सगे- संबन्धियों को खून चढाने की नौबत आये तो खून की बोतल या थैली पर 'एच.आई.वी. मुक्‍त'  की मोहर अवश्‍य देखें।
भारत में दान करने की प्रथा है,  धन व अन्‍न दान से भी अधिकतम महान रक्‍तदान है क्‍योंकि यह जीवनदान करता है।

आओं हम सभी रक्‍त दान-जीवनदान करें।


इसी कड़ी में facebook.com/sultanpurclub ने सुल्तानपुर क्लब रक्तदाता समूह बनाया है .. जिनका लक्ष्य १००० लोगों को पंजीकृत कर शहर के अस्पतालों में उनकी सूची उपलब्ध करना .. ताकि किसी की जान अब खून की कमी से ना जाए ... आपसे भी अनुरोध है की आप भी नीचे दिए गए लिंक पर अपनी जानकारी क्लब को उपलब्ध कराएँ ताकि इस नेक काम में आपकी सहभागिता सुनिश्चित हो सके .


जय हिंद जय भारत.

Wednesday, July 13, 2011

गाँधी आश्रम अहमदाबाद ...


कल मै अहमदाबाद में था ... बहुत ही अच्छा संयोग था कल ही भगवान् कृष्ण की भव्य रथयात्रा निकाली गयी थी जिसे देखने का सौभाग्य मुझे भी मिल गया उसके बाद हम कांकरिया तालाब घुमने गए बहुत ही मनोरम अनुभव था .... अंत में हमने अपने कुछ मित्रों के साथ साबरमती स्थित महात्मा गाँधी के आश्रम गए, एक पल को तो यह स्वर्णिम इतिहास को जीने जैसा अनुभव लग रहा था .... वहां के संग्रहालय में रखी गयी वस्तुएं ऐसी लग रही थी जैसे कल की हों ! एक अजीब सी शांति और सौम्यता का वातावरण था .... काफी देर घुमने के बाद ऐसा लगने लगा की हम कितने खुशनसीब हैं जो आज स्वतंत्रता की हवा में सांस ले रहे है ... कितने कष्ट सह कर क्रांतिकारियों ने हमें अंग्रेजों के चंगुल से हमें आजाद करवाया ... सच में वहां होना जैसे ऐतिहासिक घटनाओं के बीच खुद को देखने जैसा अनुभव था ... मैंने कभी भी ऐसा फ़ील नहीं किया था ... एक अजीब सा अहसास बार बार मन को झकझोर रहा था की हमने आज तक अपने देश के लिए क्या किया ? जब सब कुछ आसानी से मिल जाता है फिर भी हम सरकार, समाज और सिस्टम को गलियां देते रहतें है या फिर बुरा भला कहतें हैं पर उस समय ये भूल जातें हैं की हम उसी सरकार, समाज और सिस्टम का अभिन्न हिस्सा हैं .... ये सब भ्रष्ट हैं या गलत क्योंकि हम गलत हैं .... सफाई की शुरुआत हमें अपने आप से करनी होगी हम किसी और से ये उम्मीद नहीं कर सकते की कोई आएगा और हमारे लिए सब कुछ अच्छा करेगा. ये कम तो हमारा है और हमें खुद ही करना है ... हम भले ही एक दिन में सब कुछ नहीं सुधर सकते पर एक काम जो हम जरूर कर सकतें है की हम खुद सुधर सकतें है .... यकीन मानिये जिस पल से हम इमानदार हो जायेंगे .. कुछ हो न हो पर देश से बेईमानों की संख्या में एक अंक की कमी हो जाएगी .... और यही बहुत है... यदि हर व्यक्ति केवल अपने हिस्से की जिम्मेदारियां सही तरीके से निभाने लग जाये तो किसी क्रांति की आवश्यकता ही नहीं रहेगी ...

महात्मा गाँधी ने दुनिया को नई बात नहीं सिखलाई उन्होंने खुद कहा है की " मैंने दुनियां को कोई नई चीज नहीं सिखलाई सत्य और अहिंसा तो अनादी काल से चले आ रहे हैं " और " मेर जीवन ही मेरा सन्देश है " सच है की कोई गाँधी को तीन गोलियों से नहीं मार सकता .. गाँधी एक सोच हैं जो सदियों तक लोगों को अपने अंतर्चेतना में झांकने और जगाने के लिए हमेशा मजबूर करती रहेगी ....

किताबों में पढना एक अलग बात है पर उसे सच में अनुभव करना एक बिलकुल ही अलग बात है .....

मै उस इश्वर का धन्यवाद देता हूँ जिसने मुझे इतना अच्छा जीवन दिया ...... जय हिंद ....

Monday, September 7, 2009

Lucknow !!

ये शहर बडे पुराने हैं

बदल गई है तहजीब लखनऊ की

नवाब जाफर मीर अब्दुल्ला (अंतिम मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर के वंशज)

लखनऊ की बात आते ही तहजीब, अदब, नफासत और नजाकत जैसे शब्द एक साथ जेहन में आते हैं जहां पहले आप की संस्कृति अभी भी जिंदा है। विकास की आंधी में पुराने और नए लखनऊ में फर्क हो गया। कारण यह कि नए लखनऊ में विकास ज्यादा हुआ। अभी मैं शीश महल, हुसैनाबाद में रहता हूं, जो नवाब आसफुद्दौला का महल था। पीछे मुडकर देखने पर मुझे यहां की गंगा-जमुनी तहजीब याद आती है। 40-50 सालों में तो बहुत-कुछ बदल गया। बंटवारे के बाद पाकिस्तान-पंजाब से शरणार्थी यहां आए और यहां के काफी लोग सीमा पार गए। वे यहां के लोगों के लिए दूसरे ग्रह से आए प्राणियों की तरह थे। इससे सांस्कृतिक असंतुलन पैदा हुआ।

1952 में जमींदारी उन्मूलन के बाद ताल्लुकदारों-जमींदारों की काफी जमीनें सरकार ने ले लीं। तहजीब को सुरक्षित रखने व बचाने-बढाने में इनकी भूमिका अहम थी, लिहाजा संस्कृति पर इसका प्रभाव पडा। लखनऊ राजनीति का गढ रहा है। विकास प्रक्रिया में शहरों की तहजीब और मौलिकता भी खोती है। यहां भी मॉल्स खडे हो गए, यह एक मेट्रो शहर हो गया।

पुराना खानपान, रीति-रिवाज, बोली पुराने लखनऊ में आज भी है। लेकिन ऐतिहासिक इमारतें मरम्मत की बाट जोह रही हैं।

लखनऊ अपने खानपान, लिबास, कथक और संगीत घरानों के लिए जाना जाता रहा है। मुशायरों, शेरो-शायरी का दौर कम हुआ, ऐसे में बुद्धिजीवियों, साहित्यकारों को थोडी घुटन भी होने लगी। लेकिन सबसे सकारात्मक बात यह है कि एक ऐसे माहौल में जब नफरत की दीवारें ऊंची होती जा रही हैं, लखनऊ में सभी धर्मो के बीच सही तालमेल नजर आता है। यह बात आश्वस्त करती है।